सोमवार, 24 मई 2010

अनुगूंज



समय की रेत के नीचे
कहीं गहरे
तुम्हारी यादों की
अन्तर्धारा बह रही है
रेगिस्तान मे सरस्वती की तरह


अन्तस की उपत्यकाओं में
बहुत दूर
तैर रही है
मधुर अनुगूंज
जैसे
लौट लौट आता हो
पहाडों से टकरा कर
तुम्हारे नाम का अनहद नाद


उम्र के इस पडाव पर
हैरान हूं ;
पहाड़ वीरान नहीं हुए हैं
शाख से टूटे फूलों मे
खुशबू शेष है
कबाडी की नजरों से बच गये
शेखर "एक जीवनी" मे
दम साधे दुबकी हुई है
एक प्यारी सी चिट्ठी


वक्त की बेरहम आंधी
सब कुछ उडा सकती है
मगर प्रेम नहीं

3 टिप्‍पणियां:

Vimla Bhandari ने कहा…

पहाड़ वीरान नहीं हुए हैं
शाख से टूटे फूलों मे
खुशबू शेष है
बहुत उम्दा बात कही है आपने. सूखे फूलों में भी सुवास होती है. यादें जो मरने के बाद भी रह जाती है.

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन रचा है, बधाई.

दिलीप ने कहा…

sahi kaha prem to amar hai...