गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

माजना


    यहां भी रामबाबू से पहले उनकी ख्याति पहुँच गयी|
       “साहब बड़ा खड़ूस एकाउंटेट है| फर्जीवाड़े से सख्त नफरत है उसे| पी.ए. ने आशंका प्रकट की|
    अच्छी तरह से जानता हूं| मैंने भी कच्ची गोटियाँ नहीं खेली हैं| साम,दाम, दण्ड, भेद सब आता है मुझे| ऐसी पटखनी दूंगा कि नानी याद आ जायेगी| साहब ने जैसे अपने आप से कहा|
    सारे फर्जी बिल अटक गये| नियम विरुद्ध निविदाएं खारिज हो गयीं| उन बिलों का भुगतान भी रुक गया जो प्रथमदृष्टया सही लग रहे थे परन्तु माल स्टाक रजिस्टर में नहीं चढ़ा था| अगर चढ़ भी गया तो माल नदारद| साहब ने पहले तो प्रेम से समझाया| रामबाबू शीघ्र ही ताड़ गये कि साहब का प्रेम भी बिलों की तरह फर्जी है| दिल की बातों के साथ बिल की बातों का भला क्या मेल !फिर साहब ने प्रलोभन दिया कि फिफ्टी-फिफ्टी| लाखों के वारे न्यारे हो जायेंगे और किसी को कानों कान खबर नहीं लगेगी| इससे भी बात बनते न देख साहब ने धमकाया कि मंत्री जी से कहकर दूर गड्ढे में ट्रांसफर करवा दूंगा| जिंदगी भर सड़ते रहोगे|
  पहले से ही दूर हूं| और ट्रांसफर की धमकियों से डरने वाला नहीं हूं| बहुत हो चुके हैं| दस साल की नौकरी में बीस| समझे जनाब|
  जा,जा| बहुत देखे हैं तेरे जैसे समझाने वाले| बड़े-बड़े मंत्री बहती गंगा में नहा रहे हैं और तू ईमानदार की पूंछड़ी बना फिर रहा है| इसी माजने से भुगत रहा है| ढंग का झोंपड़ा तक नहीं बना पाया| आज यहां तो कल वहां| सोने के कड़े पहना देगी सरकार| किसी दिन लपेटे में आ गया तो सस्पेंड हो जायेगा सस्पेंड|
  सुना है ईमानदार आदमी बहुत डरपोक होता है| परन्तु रामबाबू चेम्बर से निकलते-निकलते वापस पलटे| दोनों हाथ टेबल पर टिकाये| फिर साहब की आंखों में आंखें डालकर बोले,मेरे जैसे लोग क्यों भुगत रहे हैं, बताऊं? क्योंकि ऊपर से नीचे तक तुम्हारे माजने के लोग भरे पड़े हैं| समझे?
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