सोमवार, 14 जून 2010

चिड़िया

चिड़िया
पहचानती है अपना दुश्मन
चाहे वह
बिल्ली हो या काला भुजंग .

वह
जिस चोंच से
बच्चों को
चुग्गा चुगाती है
और
किसी लुभावने मौसम में
चिड़े की पीठ गुदगुदाती है
उसी चोंच को
हथियार बनाना जानती है।

आभास होते हुए भी
कि घोंसले में दुबके बच्चे
पंख उगते ही
उड़ जाएँगे फुर्र से
अनजानी दिशाओं में,
आता देख
भयंकर विषधर
चिड़िया टूट पड़ती है उस पर
जान जोखिम में डाल
करती है दर्ज
अंतिम दम तक
अपना प्रतिरोध।

भविष्य में नहीं
वर्तमान में जीती है चिड़िया
इसी लिए हार कर भी
हर बार जीतती है चिड़िया

8 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

waah bahut khoob sandesh deti rachna

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरती से बताया की वर्तमान में जीना ही हौसला देता है..सुन्दर अभिव्यक्ति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार 22- 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है


http://charchamanch.blogspot.com/

बेचैन आत्मा ने कहा…

भविष्य में नहीं
वर्तमान में जीती है चिड़िया
इसी लिए हार कर भी
हर बार जीतती है चिड़िया
...ये पंक्तियाँ लाजवाब हैं. वर्तमान में जीने की कला कोई चिड़िया से सीखे. वाह!

arun c roy ने कहा…

चर्चा मंच के बहाने आपको पढने का मौका मिला ! चिड़िया के बहाने वर्तमान में जीने का सन्देश दिया है आपने ! सुंदर रचना !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अत्यधिक प्रेरक रचना...वाह...बेजोड़...
नीरज

माधव ने कहा…

i am Madhav as well.
meet me @ http://www.madhavrai.blogspot.com/

madhav ने कहा…

माधव से माधव का मिलन. आनंद आ गया.नन्हे फ़रिश्ते ,मासूम शैतानिओं के माध्यम से स्वयं को खूब अभिव्यक्त करो और सबके लाडले बने रहो.मेरे भी.